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विश्वास-अविश्वास के भँवर में फंसी केजरीवाल-कुमार की आप !


 

राजनीति में भी शतरंज की तर्ज पर बिसात बिछती है,और शह-मात शुरू हो जाता है। इस समय ये खेल आम आदमी पार्टी में पूरे शबाब पर है। इसके शीर्ष नेताओं में एक दूसरे को मात देने में जुटे हुए है। आज स्थिति ये है कि आप का विश्वास अब अविश्वास में बदल चुका है, ये मैं नही कह रहा हूँ। ये तो आप के नेताओं के विचार हैं। आप के संस्थापकों में से एक डॉ0 कुमार विश्वास पर पार्टी के एक वर्ग  का मानना कि वे एक डेढ़ साल से वो पार्टी लाइन से हटे हुए हैं। और पार्टी संयोजक अरविन्द केजरीवाल पर हमलावर रहे। उधर कुमार विश्वास व उनके समर्थकों का मानना है कि अरविंद केजरीवाल ने कुमार के साथ विश्वासघात किया है, इतना ही नही अपना पार्टी में वर्चस्व बनाने के लिए आप के संस्थापक सदस्यों को बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं, इसी कड़ी का एक हिस्सा कुमार विश्वास भी हैं। जो भी हो आप की आपसी लड़ाई एक और टूट की ओर बढ़ रही है। प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, किरण बेदी,कपिल मिश्रा जैसे नेताओं की बगावत ने पार्टी की नीतियों और पार्टी संयोजक की कार्यशैली पर अवश्य प्रश्नचिन्ह लगा है। अब बात करते हैं डॉ0 कुमार विश्वास की जिन पर पार्टी लाइन से हट कर काम करने का आरोप लग रहा है। डॉ0 विश्वास एक नेता के साथ उच्चकोटि के कवि हैं, साहित्य के क्षेत्र में बड़ा नाम है। इसलिये उनका अक्सर ही साहित्यिक मंचों पर अन्य दलों के नेताओं से भी भेंट होती रहती है। इसे लेकर भी उन पर अक्सर आरोप मढ़े जाते रहे हैं। राज्यसभा में टिकट न दिया जाना भी यही कारण माना जा रहा है। डॉ0 कुमार विश्वास के बारे कुछ विद्वानों का मत है कि वे पार्टी लाइन से है कर ही नही बल्कि उनके बड़बोलेपन से पार्टी को नुकसान हो जाता है। इतना ही नही वो अपना कद बढ़ाने के चक्कर में अरविंद केजरीवाल को भी लपेटे में लेने से नही चूकते थे,ऐसा उन्होंने कई बार किया भी है। उदाहरण के तौर पर बीते माह में रामलीला मैदान में आप के कार्यकर्त्ता सम्मेलन विश्वास ने केजरीवाल सहित कई बड़े नेताओं पर भरे मंच से सीधा हमला बोला था। इनका मानना है कि कोई भी  बात पार्टी फोरम में उठाया जाना चाहिये था।  इन्ही सभी के चलते उन्हें राज्यसभा का टिकट नही मिलने का खामियाजा भुगतना पड़ा । इन दलीलों के बीच अनेक राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर केजरीवाल की ये बात मान ली जाय कि विश्वास महत्वाकांक्षी हैं, तो फिर आप क्यों सीएम की कुर्सी पर चिपके हुए हो, ये बात समझ से परे है। जो व्यक्ति पार्टी के गठन से लेकर एक पूर्व तक आपके साथ कन्धा से कन्धा मिला कर पार्टी को आगे बढ़ाया । आज वही सबसे बड़ा विरोधी बन गया। अभी तक उसने बिना किसी पदलोलुपता के पार्टी में कार्य किया । अब उसे पद लोलुप कहा जा रहा है। क्या पार्टी व अपने नेताओं को समय समय पर सावधान करना गुनाह है, क्या इसी की सजा दी जा रही है। लेकिन एक बात लोगों की समझ में नही आ रही है कि जब वो पार्टी विरोधी    गतिविधियों में संलिप्त हैं ,तब पार्टी निकाल क्यों नही रही है। न ही डॉ0 विश्वास सारे अपमान सहने के बावजूद पार्टी छोड़ रहे हैं। इसके दो संकेत मिल रहे हैं,पहला पार्टी में दूसरे नम्बर की हैसियत रखने वाले  विश्वास के  पार्टी के अंदर बड़े कद को देखते हुए उनको पार्टी से निकालने की हिम्मत नही जुटा पा रहे हैं। क्योंकि पार्टी को बड़ी टूटन का खतरा दिख रहा है। वही डॉ0 विश्वास पार्टी में रह कर ही अपने भविष्य के सम्भावनाओं की तलाश कर रहे हैं। उनका ये भी मानना है कि पार्टी जब हमने बनाई है तो हम क्यों छोडें । उनके बीजेपी में जाने के भी कयास लगाये जा रहे हैं। माना जा रहा है कि कई बार उन्होंने मोदी सरकार के फैसले का समर्थन किया था ,जबकि उनकी पार्टी फैसलों के विरोध में थी। सर्जिकल स्ट्राईक पर केजरीवाल के बयान हो या फिर जेएनयू की घटना पर अरविंद केजरीवाल व उनके बयान को लेकर डॉ0 कुमार विश्वास ने असहमति जताते हुए उनके बयानों को अपना समर्थन नही दिया। उन्होंने कहा देश की अस्मिता पहले राजनीति बाद में होनी चाहिये। विश्वास को प्रखर राष्ट्रवाद के रूप में जाना जाता है। पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं के दिलों में राज करते हैं। इन्हीं युवाओं के बल पर दम भरते हैं। फिलहाल जो भी हो जिस प्रकार आम आदमी पार्टी से पुराने नेताओं का निकलना पार्टी को भारी पड़ सकता है। जो नेता अब तक निकल चुके हैं ,वो सभी निकलने व विरोध का कारण अरविंद केजरीवाल को ही जिम्मेदार मान रहे हैं।डॉ0 कुमार विश्वास का पार्टी छोड़ने की स्थिति पर पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है, क्योंकि उन्हें पार्टी के भीतर चाहने वालों की कमी नही है। शायद केजरीवाल का विश्वास पर अविश्वास जताना मजबूरी तो नही है, या फिर पार्टी में अपना पूर्ण वर्चस्व रखना चाहते हैं। ये वक्त के गर्भ में समाहित है।
@NEERAJ SINGH

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