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क्या होगा इस पतित पावन देश का ..........!

मंथन.....

कभी कभी देश की दशा व लोगों की सोच पर मंथन करता हूँ, मन द्रवित हो उठता है। जिस आजादी के लिए सौ वर्ष से भी अधिक संघर्ष करना पड़ा । लाखों लोगों ने कुर्बानियां दी । तब जाकर देश आजाद हो सका । आज इसी आजादी का मजाक बनाया जा रहा है। हमारे राष्ट्रीय गीत ,राष्ट्रगान व राष्ट्र ध्वज को सांप्रदायिक नजरिये से देखने का काम हो रहा है। जिस ध्वज के तले अपनी जान न्यौछार करने वाले चाहे हिंदू रहे,मुस्लिम रहे या फिर सिख धर्म के रहे वो जाति- धर्म के नाम पर उनकी पहचान नहीं थी बल्कि एक भारतीय रूप में बलिदान किया था। ये उनका अपमान नही तो और क्या है। क्या हो रहा है हमारे संविधान ने देश की जनता को बोलने का मौलिक अधिकार दे दिया है तो इसका मतलब ये नही कि आप किसी को गाली देने लगो। राष्ट्र की अस्मिता से जुड़ी चीजों का अपमान करना शुरू कर दें,ये सही नही है। आज राष्ट्र भक्ति व राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों को बताना पड़ेगा! इससे देश की दशा व सोच का पता चलता है।लेकिन मायने ये रखता कितने इसका समर्थन करते हैं।  जब हाथों में ध्वज ,जुबान में बन्देमातरम् का गीत लिए अंग्रेजों से लड़कर स्वतन्त्रता के दीवानों ने अपने प्राणों की आहूत देकर हमें आजादी दिलवाने का काम किया गया। उसी को ध्वज व गीत को तथाकथित लोग जिसमें राजनीतिक भी शामिल हैं  , सांप्रदायिक चश्मे से देख रहे हैं । क्या जब हिन्दू व मुसलमान भाई इसे गाते हाथों लेकर चलते तो तब सांप्रदायिक नही था। हद हो गई है कि देश की कोर्ट व सरकार ये याद दिलाये कि राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाय और राष्ट्रगान होना चाहिए।राष्ट्र गान पर विवाद पहले भी हुआ था जब कांग्रेस का 27 वां अधिवेशन कलकत्ता में 27 दिसंबर1917 को हुआ था । जिसमें ये आरोप लगा कि अधिनायक शब्द का गान में रविंद्र नाथ टैगोर ने अंग्रेजों के दबाव में लिखा था। बहुत सी बातें हुई, लेकिन इसे ख़ारिज भी किया गया और आज की युवा पीड़ी इस गान से देश के प्रति समर्पण की भावना जगाने के रूप में देखती है। आखिर क्या जरूरत पड़ी यूपी में योगी सरकार को कि मदरसों में 15 अगस्त व 26 जनवरी को इन राष्ट्रीय पर्वों को मनाया जाये, राष्ट्रीय ध्वज फहराने व राष्ट्रगान भी हो आदेश जारी करना पड़ा। जिस पर देश तथाकथित सेक्युलर हस्तियां सक्रिय हो गई।अरे नही साहब ये तो राजनीति से प्रेरित आदेश है, अल्पसंख्यक को परेशान करने के लिए है। और चैनलों पर बैठे बैठे मदरसों को क्लीन चिट दे दिया कि ये सब पहले से ही होता रहा है। सरकार का आदेश शिफूगा भर है ,बहुसंख्यक को खुश करने के लिए।  लेकिन इन दावों की पोल तब खुल गई ,जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक रिट दाखिल की गई जिसमें कहा गया कि मदरसों में सरकार के आदेश से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचता है। अब सवाल ये उठता है कि जिस गान से देश की अस्मिता , असहिष्णता,एकता व अखण्डता को बल मिलता है। उसे गाने क्या हर्ज है,कैसे धर्म खतरे में पड़ जाता है? लेकिन हाई कोर्ट करारा जबाब देते हुए याचिका को ख़ारिज कर दिया है। अब मदरसों के मौलाना मीडिया के माध्यम से इस मामले की मजम्मत करते दिखेंगे और कहेंगे कि हमने कब कहा कि राष्ट्रगान नही होना चाहिये। देश आजाद हुआ ,आजादी से पहले लोगों को बोलने की छूट नही थी अब जब बोलने की आजादी मिली तो कभी आतंकियों, तो कभी देश में राष्ट्रीय ध्वज,गान, व गीत पर ही बखेड़ा खड़ा कर देंगे। रही इन तथाकथित सेक्युलर नेताओं की ये वो दीमक हैं जो जहाँ रहते उसी को कमजोर करने का कार्य करते हैं। लोकतांत्रिक देश को जाति धर्म के नाम बांटने का कार्य करते हैं। जब ममता दुर्गा विसर्जन पर रोक लगाती हैं तो चुप , मदरसों पे ध्वज फहराने को कहना तुष्टीकरण हो जाता है।  कश्मीरी पंडित अपने ही देश शरणार्थी बने हैं , लेकिन चिंता रोहिंग्या की है।  म्यांमार में सैकड़ों हिंदुओं का नरसंहार होता है ,इस पर चुप्पी साध लेते हैं और यहाँ एक अखलाक मरे तो हंगामा हो जाता है। आखिर अपने को  सेक्युलर नेता व पार्टी बताने वाले क्या चाहते हैं। क्या हो गया है अपने देश के इन नेताओं को कि चंद स्वार्थों के लिए देश को विदेशों तक बदनाम करने का रास्ता छोड़ नही रहे हैं। एक लोकतांत्रिक देश केआने वाले भविष्य  लिये घातक हो सकता है। राष्ट्र से जुड़ी भावनाओं के प्रति टिप्पणियाँ करने वालों के साथ कड़ाई से पेश आने की आवश्यकता है। और उन पर हुई कार्यवाही देश विरोधी तत्त्वों के सबक होगा। फिर न सरकार और न कोर्ट को याद दिलाने की आवश्यकता होगी कि ये देश की अस्मिता का मामला है। अगर इन्हें इसी तरह बेलगाम रखा गया तो इस पतित पावन देश का भविष्य क्या होगा....!
जय हिन्द,जय भारत।
@NEERAJ SINGH

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