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बापू के देश में हकीकत स्वच्छ भारत की.......!

‌आज हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी 148वीं जयंती को राष्ट्रीय स्वच्छता दिवस के रूप में विगत तीन वर्षों से मना रहे है। आज  स्वच्छता दिवस की तीसरी वर्षगांठ हैै। गाँधी जयंती के 145वें वर्ष 02 अक्टूबर 2014 को देश के प्रधानमंत्री ने स्वच्छता अभियान की शुरुआत किया था।   पूरे देश में इसे लेकर काफी उत्साह देखने को मिला। मुंबई में लोग सड़कों पर दौड़े। तो दिल्ली सहित देश के बिभिन्न भागों में लोग झाड़ू लेकर सड़कों, पार्को सहित सार्वजनिक स्थानों पर जमकर सफाई गीरी  की गई। प्रिंट मीडिया ने बड़े बड़े कॉलम लिखे ,सरकारों ने विज्ञापन के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया गया । इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने स्वच्छता पर कार्यक्रमों को ऑर्गेनाइज किया, जिसमें डिवेट के साथ इस क्षेत्र में अच्छे कार्य करने वालों को पुरस्कार भी दिए गए। जिसमें उपराष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री जैसी हस्तियों ने भाग लिया । राष्ट्रपति आज के दिन पोरबन्दर पहुंचे। भारत सरकार के इस अभियान में गांधी जी के 150वीं जयंती 02 अक्टूबर 2019 पर देश को करीब 1.20 लाख शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा है जिसमें 1.96लाख करोड़ खर्च होने का अनुमान है। इससे करीब 2.50 गाँव वाह्य शौच मुक्त हो जायेंगे। अभी तक सिक्कम ,हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड व केरल राज्य वाह्य शौच मुक्त की श्रेणी में आ चुका है, जबकि कार्यक्रम की शुरुआत में सिक्किम शौचमुक्त राज्य था। अब सवाल ये है कि की ये राज्य वास्तव में शौच मुक्त हुए हैं। हाँ एक बात सरकारी आंकड़ों पर दिखा जिसमें साफ़सुधरा माहौल 38%से लगभग67% तक पहुँच चुके हैं। अब जरा हकीकत पर नजर डालें कि क्या देश गन्दगी मुक्त की ओर बढ़ रहा है! गांधी ने स्वच्छता पर कहा था कि स्वच्छता स्वतन्त्रता के अधिक जरुरी है, स्वच्छता ही स्वराज है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने कहा श्रेष्ठ भारत के लिए स्वच्छ भारत  शस्त्र है।  जी यह बिल्कुल सही है। स्वच्छता के बिना कुछ भी नही है। लेकिन स्वच्छता अभियान में सभी जुड़ना चाहते हैं ,लेकिन करना नही चाहते हैं । पहले आप मानसिक रूप से तैयार होंगे तभी भारत स्वच्छ होगा। आज स्थिति ये है कि शौच मुक्त के लिए बन रहे शौचालय भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। वही जनमानस आज भी स्वच्छता के लिये मानसिक रूप से तैयार नही  हैं। इसे प्रधानमंत्री मोदी भी मानते हैं कि जिन शौचालयों का निर्माण कराया बाद में देखा कि उसमें बकरियां बंधी हैं। स्वच्छता अभियान में सरकार ने करोडों  विज्ञापन पर खर्च कर दिया। लेकिन आज भी स्थिति जस का तस बनी हुई है। नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत को ये योजना सिद्ध कर रही है। फिर इसकी आलोचना करना अच्छा नही लग रहा है। क्योंकि ये एक अच्छा कदम है इसे आगे ले जाने में समाज के हर व्यक्ति को जुड़ना चाहिये। लेकिन जबर्दस्ती नहीं वर्ना इंदिरा जी द्वारा जारी नसबन्दी योजना वाली स्थिति होगी। इसे सरकार द्वारा देश की जनता को मानसिक रूप से तैयार करने की जरूरत है। कागजी आंकड़े नही वास्तविकता की आवश्यकता है।  रही बात शौचालयों के निर्माण पर इनमें पारदर्शिता लाने की जरूरत सरकार को समझनी चाहिये। भारतीयों के लिए यह बहुत ही आवश्यक है कि वह भावनात्मक, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से अच्छा महसूस करें।विद्यालय में इससे संबंधित पाठ्यक्रम को बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिये, जिससे बचपन से ही इसके प्रति बच्चों में स्वच्छता के लाभों की जानकारी हो। वास्तविक मायने में भारत में रहन सहन की स्थिति अच्छा बनाना जरूरी है, जो कि स्वच्छता को अपना कर  शुरू की जा सकती है। तभी स्वच्छ भारत का सपना सच साबित होगा। यही बापू जी को सच्ची श्रधांजलि होगी।

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