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पत्रकारों की जमात का विभाजन क्यों .........!



 जब हमारी पत्रकारों की जमात अपनी वरिष्ठ लेखिका गौरी लंकेश की हत्या के गम में डूबा हुआ है, ठीक उसी समय लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ जिसे समाज का आइना कहा जाता है उसे भी विभाजन का कुत्सित प्रयास कुछ तथकथित सेक्युलर नेताओं द्वारा किया जा रहा है। जैसे ही गौरी लंकेश की हत्या बेंगलुरु में हुई कि उसके चंद मिनट में ही सोशल साईटों पर उनकी हत्या का जिम्मेदार भी बताया जाने लगा बिना जांच के ही। अब गौरी लंकेश की हत्या को सियासी जामा पहनाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी जा रही है। इतना ही नहीं एक निर्भीक, निडर निष्पक्ष पत्रकारिता करने वाली महिला पत्रकार को बीजेपी विरोधी करार दिया गया। हिन्दू वादी संगठनों व बीजेपी पर भी आरोप लगाये जा रहे हैं कि उनकी हत्या में इनका हाथ है।  क्या ये सही है कि बिना किसी जांच के आरोप लगाये जाने चाहिए! हर पत्रकार के अपने अपने विचार होते हैं। इसी विचारों के चलते अक्सर ही हर दल व संगठन के प्रति अपना अलग ही नजरिया होता है। लेकिन इसका मतलब ये नही की जिसके विचारों  से पत्रकार के विचारों में विरोधाभास हो तो पत्रकार की हत्या कर दी जाय। ये समझ से परे है। रही बात गौरी लंकेश की  तो वो बीजेपी के विरोध में अक्सर ही लेख लिखती रहती थी। माओवादी को मुख्यधारा में लाने का प्रयास अपने लेखों के माध्यम से करती थी। इससे माओवादियों में भी इनके प्रति आक्रोश रहता था। इतना ही नहीं मीडिया रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि जिस लेख पर काम कर रही थी वो  कर्नाटक प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर था । जिसमें अनेक गहरे खुलासे हो सकते थे। जो भी हो जिस प्रकार सियासत में पत्रकारों को पार्टी विशेष की संज्ञा देकर विभाजन का     षड़्यंत्र हो रहा है,बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। दिल्ली में प्रेस ऑफ़ इंडिया  में शोक सभा में  बामपंथी नेता डी राजा, कन्हैया कुमार, शेरान शाहिद,ने मातम की सभा को सियासी अखाड़ा बना दिया। और गौरीलंकेश को वामपंथी विचार धारा की पत्रकार घोषित कर दिया। अब प्रेस ऑफ इंडिया पर भी सवाल उठ रहा है कि आप पत्रकारों की इतनी हिमायती हो तो जब हेमन्त यादव, जगेंद्र सिंह,संजय पाठक व राजदेव रंजन सीवान की हत्याओं पर इस संगठन ने क्या किया है ! 1992 से अब तक दर्जनों पत्रकारों की हत्याओं का जिम्मेदार कौन है, अब किसी मामले किसको सजा मिली कोई सरकार भी स्वीकार करने की स्थित में नही है। असम में हाल के वर्षों में चार  दर्जन पत्रकारों की हत्या हुई।  कितने में कार्यवाही हुई और कितने दोषियों को सजा मिली ,नतीजा शून्य ही रहा है। विश्व की एक जानी मानी सर्वे Ajenci ने विश्व में पत्रकारों की दशा पर  180 देशों में serves किया है। जिसमें भारत 134वें पायदान पर है और North Koriya सबसे निचले और नार्वे सबसे ऊपर है। भारत की ये स्थिति से पता चल जाता है कि यहाँ पत्रकारों की हालत कैसी है। गौरीलंकेश की हत्या के बहाने ही सही नेताओं ने इसे सियासी रंग देना शुरू कर दिया है। बीबीसी के पत्रकार परवेज आलम का कहना है कि हमें इनसे सावधान रहने की जरूरत है। जिससे हमें सियासी रूप से विभाजित न कर सके। सही कहा परवेज जी ने अगर एक बार किसी दल या संगठन का राजनीतिक ठप्पा लग गया तो समाज का विश्वास ख़त्म हो जायेगा। हमें और पत्रकारिता के जमात को सियासतदानों की इस साजिश को अपने Unity के बल पर नाकाम करना होगा । और सत्ता पर एकजुट होकर अपनी सुरक्षा व भविष्य के वजूद के लिए दबाव बनाने का समय आ गया है। अपने हक की लड़ाई हमसब को मिलकर लड़नी होगी। यही गौरीलंकेश को सच्ची श्रधांजलि होगी।  .........।
@Neeraj Singh

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