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एक कानून दो व्यवस्था कब तक !


हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। आजादी के बाद देश में एक विस्तृत संविधान लागू हुआ। जिसमें लिखा गया कि देश का हर नागरिक अमीर- गरीब,जाति-धर्म,रंग-भेद,नस्लभेद क्षेत्र-भाषा भले ही अलग हो लेकिन मौलिक अधिकार एक हैं।कोई भी देश का कोई भी एक कानून उपरोक्त आधार बांटा नही जाता है । सभी के लिए कानून एक है। अगर हम गौर करें शायद ये हो नही रहा है। एक कानून होते हुए व्यवस्थाएं दो हो गई है। आम आदमी के लिए कानून व्यवस्था संविधान के अनुसार होती हैं। लेकिन विशिष्ट लोगों के लिए व्यवस्था बदल जाती है।विशेष रूप से राजनेताओं के लिए कानून व्यवस्था का मायने ही बदल जाता है। उदाहरण के तौर पर  आमजन  कानून हाथ में लेता है तो पुलिस उसे सफाई देने तक का मौका नही देती है और जेल में ठूंस देती है। वहीं राजनेता कानून अपने हाथ लेता है ,तो वही पुलिस जांच का विषय बता कर गिरफ्तारी को लेकर टालमटोल करती है। क्या एक कानून दो व्यवस्था नही है ! लालू का परिवार भ्रष्टाचार में फंस गया है, इसे लेकर सीबीआई की कार्यवाही को लालू प्रसाद यादव राजनीति से प्रेरित और केंद्र सरकार पर  बदले की भावना से कार्यवाही का आरोप लगा रहे हैं। हद अब हो रहा है कि उसकी सहयोगी पार्टी जद यू इस कार्यवाही पर बोलने को तैयार नही है। उधर कांग्रेस व समाजवादी पार्टियों ने लालू के बचाव में मोर्चा संभाल रखा है और बीजेपी पर विपक्षियों को दबाने का आरोप लगा रही हैं। जब सीबीआई ने लालू राबड़ी व बिहार के उपमुख्यमंत्री सहित कई पर मुकदमे दर्ज हो चुके हैं तो आखिर पुलिस कार्यवाही से क्यों कतरा रही हैं। यही तो विडंबना है कि आमजनता पिस रही है और कानून के दोहरे व्यवस्था से मार खा रही है। वहीं विशिष्ट जन व नेतागण इसी फायदा उठाकर कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं।
‌                                              @ नीरज सिंह 

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