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अपने ही क्षेत्र में विरोध का सामना कर रहे राहुल गांधी

देश की सियासत में अमेठी का मुकाम अहम है। हो भी क्यों न क्योंकि इसका रिश्ता देश के सबसे बडे राजनीतिक घराने गांधी परिवार से जुडा हुआ है। इस राजनीति की विरासत को वर्तमान में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी सम्भाल रहे हैं। लेकिन मंगलवार को राहुल गांधी के अमेठी दो दिवसीय दौरे की समाप्ति के बाद राजनीतिक विश्लेषकों को इस तरफ सोचने को मजबूर हो चला है।इस बार का दौरा काफी हंगामें पूर्ण रहा। गांधी परिवार की पुश्तैनी सीट पर इस प्रकार भारी विरोध का सामना करना कहीं न कहीं सब कुछ ठीक नहीं दिख रहा है। गौरतलब है कि सत्तर के दशक में अमेठी से गांधी परिवार के पहले सदस्य के रूप में संसदीय सीट पर संजय गांधी ने चुनाव लडा था , लेकिन 77 की जनता लहर में जनसंघ के प्रत्याशी से चुनाव हार गये। 1980 में पुनः चुनाव लडा और भी गये। उनकी आसमयिक मौत के बाद राजीव गांधी यहां लगातार चार चुनाव जीते लेकिन 1991 के चुनाव दौरान ही उनकी हत्या हो गई और उनकी चरण पादुका लेकर आये उनके सखा कैप्टन सतीश शर्मा को भी हाथों हाथ लिया लेकिन अगले चुनाव में भाजपा के डा0 संजय सिंह से हार गये। अगले चुनाव में श्रीमती सोनिया गांधी को जनता ने बडी जीत दिला कर गांधी परिवार में एक बार अपनी आस्था दिखायी। 2004 में सोनिया गांधी  पडोस के रायबरेली सीट पर चुनाव लडा और यहां से राहुल गांधी को चुनाव मैदान उतारा और पुनः जनता ने उन्हे तीन लाख अधिक मतों के अंतर से जीत दिलाकर सर आंखों पर बैठाया। लेकिन इसके बाद से कांग्रेस का गढ माने जाने वाला अमेठी की दीवारें दरकने लगी, एक के बाद एक बडे छोटे चुनाव हारने लगी, और भाजपा की मजबूती बढने लगी। पुराने कांग्रेसी इस बात को मानते हैं कि कांग्रेस में कार्यकत्र्ताओं के प्रति नेताओं का रूखा रवैये का असर पार्टी के संगठन पर पड रहा है। अमेठी में कांग्रेस की मुसीबत और बढ गई जब 2014 को लोकसभा चुनाव में भाजपा स्मृति ईरानी को मैदान में उतार दिया। उनकी हार के बाद भी सक्रियता का नतीजा है कि विधानसभा चुनावों में अमेठी लोकसभा की विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की एक भी सीट नही बची है। नगर निकाय चुनावों में भी पार्टी की यही हालत है। भाजपा का आधार दिनोंदिन बढना राहुल गांधी के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव भारी दिख रहा है।इस बारे में कांग्रेस व राहुल दोनों को मंथन की आवश्यकता है। विगत दिनों भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह व मुख्यमंत्री योगी के कार्यक्रम लगने से भाजपाईयों में उत्साह से भरे हैं। समय समय पर बडे नेताओं का दौरा होता रहा है। जिस तरह इन दो दिनों के दौरे में राहुल गांधी का भारी विरोध ने यह अवश्य जता दिया कि अब गांधी परिवार का एकछत्र राज अमेठी में होना गुजरे जमाने की बात हो गई है। कांग्रेस का प्रभाव घटने का कारण 2004 से 2014 तक विकास के मुद्दे, कार्यकत्र्ताओं व जनता से दूरी व सांगठनिक ढांचे में सक्रियता की कमी भी राजनीतिक विश्लेषण मानते हैं। फिलहाल कांग्रेस व राहुल गांधी को इन कारणों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है, और कैसे भाजपा के बढते आधार को रोका जा सके।क्योंकि लोकसभा चुनाव को एक वर्ष ही बचा है। जोकि राहुल व कांग्रेस दोनो के लिए एक अग्निपरीक्षा साबित होना तय है। वैसे अमेठी में गांधी परिवार को चाहने वालों की कमी नहीं है।
@NEERJ SINGH

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