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दोराहे पर खड़ी है, देश की राजनीति

देश की राजनीति ऐसे मुहाने पर खड़ी है कि राजनेताओं की बुद्धि कुंद होती जा रही है। सोचने समझने की समझ पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।  आखिर इस लोकतांत्रिक देश का भविष्य दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है,कि जनता भी नहीं समझ पा रही है , क्या सही है, क्या गलत है, हर बात , हर घटना को मीडिया भी ऐसा पेश कर रही है  कि जनता के लिए सही गलत का फैसला करना भी कठिन हो रहा है। इस विशाल लोकतंत्र में तरह - तरह की भाषाएं बोलने वाले अलग-अलग जाति व धर्म के लोग रहते हैं, उनका रहन सहन रीति रिवाज व अलग अलग प्राकृतिक माहौल में जीवन यापन करते हैं। यही अनेकता में एकता का बोध कराते हैं । लेकिन पिछले कुछ दशक से देश में जाति भाषा धर्म क्षेत्र आदि जैसे मुद्दे पर देश को बांटने का काम किया जा रहा है। इतना ही नहीं अनेक तथाकथित राजनीतिक दलों के नेता  देश में लिंचिंग जैसे मामलों को लेकर देश के बंटवारे की बात करते हैं। अभी हाल ही में BJP व पीडीपी के बीच जम्मू कश्मीर में सरकार का समझौता टूटने के बाद पूर्व मंत्री मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती व उनकी  पार्टी के नेता अनाप-शनाप बयानबाजी कर रहे हैं । महबूबा मुफ्ती को कश्मीर में सलाउद्दी…
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पीएम मोदी की हत्या की साजिश खुलासे को लेकर राजनीति क्यों....!

पीएम मोदी की हत्या की साजिश में राजनीति क्यों ....!
‌देश की राजनीति की दिशा किस मोड़ पर पंहुच रही है, अनेक सवाल उठने लगे हैं। आज की राजनीतिक उठापटक लोकतांत्रिक ढांचे को कितना मजबूत या कमजोर करेगी इसका आकलन होना बाकी है। जिस देश में आतंक की बेदी पर दो-दो प्रधानमंत्रियों के जीवन का बलिदान हो गया हो , वहीं प्रधानमंत्री की नक्सलियों द्वारा हत्या की साजिश मामले में विपक्षियों ने दलित मुद्दा खोजना शुरू कर दिया है, कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है। आतंकी हों या फिर नक्सली हों । ये सभी मानवीय दुश्मन ही हैं। अगर इनमें भी मुस्लिम या फिर दलित के नाम पर इनका बचाव किया जाय तो एक लोकतंत्र के लिए इससे शर्मनाक घटना और क्या हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश का खुलासा हाल में हुई कोरेगांव के दंगे की  सुरक्षा एजेंसियों की जांच के दौरान हुई। इस घटना के तार तो नक्सलियों से जुड़े हैं।इस जांच के दायरे में कई जाने माने वामपंथी सोच के प्रोफेसर आये जो नक्सलियों के पक्षधर के रूप में जाने जाते हैं। इन्हें पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया और इनके घरों में सुरक्षा एजेंसी को अनेक दस्तावेज व चिट्ठियां मि…

आरएसएस के कार्यक्रम में जाना अपराध है क्या...!

देश में एक ही मुद्दा छाया है कि  पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी आरएसएस के कार्यक्रम में नागपुर जा रहे हैं। उन्हें जाना नही चाहिए । ये बिल्कुल सही नही है। अनेक पार्टियों के प्रवक्ता बयानबाजी में मशगूल है। अब हम बात करते हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ,जिसकी स्थापना डॉ0 बलिराम हेगड़ेवार द्वारा 27 सितम्बर 1925 में नागपुर, महाराष्ट्र में की गई। इस संगठन का ध्येय मातृभूमि की सेवा करना ,और राष्ट्र की रक्षा करना । ये एक हिन्दू वादी संगठन माना जाता है। इसके आब तक 09 सर संघचालक हुए हैं।वर्तमान में सरसंघ चालक मोहन भगवत् हैं।संघ का कहना है कि हमारा संगठन मातृभूमि की सेवा , निरीह,दबे कुचले गरीबों की सेवा के लिए तत्पर रहता है। इसका उदाहरण 1962 का भारत -चीन युद्ध रहा हो जिसमें घायलों की मदद किया या फिर गुजरात के कच्छ व भुज के भूकंप पीड़ितों की सहायता रही हो। ऐसे अनेक मौकों पर संघ के स्वयं सेवकों पर लोगों की मदद के लिए आगे आया है। आज देश 70हजार से अधिक आरएसएस की शाखाएं चल रही हैं। लेकिन ये संगठन विवादों में भी रहा है। इनके आलोचकों का मानना है कि ये संगठन कट्टर हिंदूवादी है,समाजसेवा का मात्र चोला पहन …

आमजन के ज़हन बसा बीजेपी का अहम , बना हार का कारक..!

देश में 10 विधानसभा व 04 लोकसभा उपचुनाव  में बीजेपी को मिली करारी शिकस्त राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर रहा है कि 2019 के आम चुनाव से पहले जनता का मोदी सरकार व बीजेपी को बदलाव का  संकेत तो नही हैं। एक बड़ा सवाल उभर कर सामने आ रहा कि कहीं  आमजन के जहन में ये तो नही बस गया है की  बीजेपी की लगातार राज्यों में हुई जीत से पार्टी व उनके नेताओं में  अहम तो नही आ गया है जोकि बीजेपी के हार का कारक बन गया हो । इस चुनाव को इसलिये भी महत्वपूर्ण माना जा रहा था कि अब लोकसभा आम चुनाव होने एक साल से भी कम रह गए हैं। भले ही बीजेपी नेता व उनके प्रवक्ता चिल्ला चिल्ला कर सफाई दे रहे हैं कि उपचुनाव से आम चुनाव अलग होते  हैं।आइए गौर करें तो 2014 में बीजेपी की सरकार प्रचण्ड बहुमत आई।दो वर्ष तो सब कुछ ठीक रहा । लेकिन 2016 से 37 उपचुनाव में से बीजेपी को 31 में हार का मुँह देखना पड़ा , एक सकून 2017 में रहा जब बीजेपी की यूपी में भारी बहुमत की सरकार योगी जी के नेतृत्व में बनी।लेकिन उसके बाद से बीजेपी के लिए कोई अच्छीखबर लेकर नही आयी है। लोकसभा गोरखपुर, फूलपुर, और अब कैराना साथ में नूरपुर विधानसभा में मिल…

जीवन जीने की कला ही जीवन का सार है ....!

जीवन का सार शास्त्रों, उपनिषदों बाइबिल,कुरान आदि धार्मिक ग्रंथों में भरा पड़ा है। इसे लेकर अनेक विद्वान व विदुषी अपने विचार रखा है।अरस्तू, प्लेटो जैसे अनेक महान विचारकों में अपने अपने मत दिए हैं। सबके अपने विचार व मत हैं। सच तो ये है जीवन में घटित घटनाओं से जीवन के सार का अर्थ मिलता है और वही सही मनुष्यों को नजरिया प्रदान करता है। जीवन जीने कला है, जीवन एक संघर्ष है, जीवन अनमोल है न जाने किन किन वाक्यों से जीवन को अभिभूत किया जाता है। मेरा मानना ये कतई नही है कि ये सारी बातें गलत हैं। मैं तो अपने  नजरिये से जीवन को देखता हूँ।जीवन के सार की व्याख्या श्रीमद्भागवत गीता में है जिसमें न केवल धर्म का उपदेश देती है, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाती है। महाभारत के युद्ध के पहले अर्जुन और श्रीकृष्ण के संवाद लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। गीता के उपदेशों पर चलकर न केवल हम स्वयं का, बल्कि समाज का कल्याण भी कर सकते हैं। ऐसे ही वर्तमान जीवन में उत्पन्न कठिनाईयों से लडऩे के लिए मनुष्य को गीता में बताए ज्ञान की तरह आचरण करना चाहिए। इससे वह उन्नति की ओर अग्रसर होगा। गीता में लिखा है क्रोध से भ्रम …

सत्ता की बेदी पर जवानों की बलि....!

एक कहावत याद आ रही हम्माम में सभी नंगे होते हैं। इस कहावत को चरितार्थ कर रही हमारे देश की सत्ता लोलुप राजनीतिज्ञ। कोई भी ऐसी पार्टी नही है , जो सत्ता की कुर्सी से पहले देश हित की बात करती हो । देश की राजनीति जैसे दिशा व दशा दोनों बदलती जा रही है। अल्पसंख्यक समुदाय को रिझाने के लिए टोपी पहनी जाती है,नमाज पढे जाते हैं, रोजा खोले जाते हैं । वहीं बहुसंख्यक को रिझाने के लिए तिलक लगाना,दर्शन करना, पूजन किया जाता है। ये सब करना गलत नही है,लेकिन वोट लिए दिखावा करना बिल्कुल गलत है। राजनेताओं का तुष्टीकरण की नीति अपनाना बेहद निंदनीय कृत्य है, पर सबकुछ हो रहा है। लेकिन अपने को राष्ट्र वादी पार्टी का दम्भ भरने वाली केंद्र की सत्ता ने अक्सर आतंकियों का मुखाल्फत करने वाली जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा के अनर्गल फैसले पर मुहर लगाकर सत्ता की बेदी पर जवानों की बलि चढाने जैसा घृणित निर्णय लिया है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने रमजान के महीने में आतंकियों व पत्थरबाजों के खिलाफ कार्यवाही रोकने की बात कही है। इस निर्णय के ठीक दो घण्टे के अंदर आतंकी हमला हो गया। पाक ने सीजफायर का उलंघन चालू है।  …

दुश्मनों पर रहम का अनर्गल प्रलाप क्यों .....!

कश्मीर को आतंकी पंजे से मुक्त करने में लगे सेना के जवानों की मुहिम रंग लाने लगी है। कश्मीर की जम्हूरियत को शांति का सकून दिलाने की ओर अग्रसर भारतीय फौज के जवानों के मनोबल तोड़ने की साजिश के तहत प्रदेश की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती का बयान आया है। उनका कहना है कि जिस प्रकार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी रमजान के मौके पर सीजफायर का ऐलान किया था उसी तर्ज पर इस बार भी रमजान के मौके पर आतंकियों के खिलाफ चल रहे मुहिम को रोक दिया जाना चाहिए। ये बयान कहाँ तक उचित है कि जो गलती पिछली सरकारों की हैं, उसी गलती को पुनः दोहराना कितना सही है,बजाय सबक लेने के! जब बाजपेयी सरकार ने सीजफायर करने का ऐलान किया था ,ठीक उसी दरम्यां जमकर सीजफायर का उलंघन आतंकी गतिविधियों में इजाफा भी हुआ था। एक बार फिर वही गलती दोहराने के संबंध में महबूबा मुफ़्ती का बयान नाकाबिले तारीफ है। अब जब कि घाटी में सेना की आतंक़ियों के खिलाफ चल रही ताबड़तोड़ एनकॉउंटर की कार्यवाही दहशतगर्दी की कमर तोड़कर रख दिया है। घाटी में बुरहान वानी से लेकर अनेक कमांडर सेना व पुलिस की  कार्यवाही में मारे जा चुके हैं। लेकिन रमजान के पाक महीने से…