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राफेल डील, बोफोर्स काण्ड की पुनरावृत्ति तो नहीं!

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ये दोस्ती हम नही छोड़ेंगे......

उक्त गीत की लाइन मशहूर फिल्म शोले की है । जिसमें दो दोस्त जय व बीरू अपनी दोस्ती की कसमें खाते हैं,और ये गीत गुनगुनाते हुए दिखते हैं। ठीक उसी प्रकार भारत और रूस के बीच की दोस्ती भी किसी भी कीमत पर ना टूटने पाये, इसके लिए दोनों देश के सरकारें हर कुर्बानी देने के लिये तैयार रहती हैं। दशकों के पुराने रिश्ते को एक बार फिर मजबूत करने के लिए रशियन राष्ट्रपति आज दो दिन के भारत के दौरे पर हैं। वर्तमान वैश्विक परिवेश में भारत जैसे विकासशील देशों को अमेरिका और रूस जैसी विकसित महाशक्तियों की जरूरत है । भारत को वायु रक्षा प्रणाली की जरूरत है जो कि राष्ट्रपति पुतिन इसी दौरे में इसे लेकर समझौता करने वाले है। लेकिन ट्रम्प सरकार आने के बाद 50 व 60 के दशक जैसे हालात बन गए हैं । एक प्रकार से शीत युद्ध जैसा माहौल विश्व में बन चुका है । आज देश दो गुटों में बंटा हुआ दिख रहा है।एक तरफ की अगुवाई अमेरिका कर रहा है तो दूसरी तरफ की अगुवाई रूस कर रहा है। इन दोनों महा शक्तियों के बीच बीच में विकासशील व गरीब देश पिस रहे हैं ।आज भारत जैसे देशों को दोनों देशों के बीच संतुलन बनाने की कठिन चुनौती सामने  है । अगर देश …

अपने ही मातृभूमि में बेगानी हो गई है मातृभाषा हिन्दी

देश हर वर्ष की तरह इस बार भी 15 सितम्बर से हिन्दी पखवाडा चल रहा है। जोकि 29 सितम्बर को समापन होगा।बात करें हिन्दी की तो मातृभाषा जिसे राजभाषा का दर्जा मिला है पर पूर्ण दर्जा पाने के लिए आज भी जद्दो जहद हिन्दी अपनी ही जन्मभूमि में ही बेगानी नजर आ रही है। वहीं कम्प्यूटरीकरण से हिन्दी को करारा झटका लगा है। स्थित यह कि सरकारी दफ्तरो में अधिकांश कामकाज अंग्रेजी भाषा मे होता है। परिणाम स्वरूप हिन्दी को व्यवसायिक राज्यभाषा का दर्जा नही मिल सका है। राजभाषा हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए केन्द्र सरकार के दफ्तररों मे हिन्दी अधिकारी नियुक्त किए गए हैं, स्पष्ट आदेश हेै कि हिन्दी मे। कामकाज किए जाएं। लेकिन बी एस एन एल, डाक, रेल आदि जैसी महत्वपूर्ण विभाग हिन्दी का इस्तेमाल नही करते है। जिसमे लम्बे चौड़े दावे होेते हैं, लेकिन जब इन दावों के क्रियान्वयन की बारी आती है तो जिम्मेदार अधिकारी हाथ खडा कर लेते है। आम तोैर पर बी एस एन एल दफ्तर है जिसमे टेलीफोन, मोबाइल बिल अग्रेजी भाषा मे जारी होते है। कनेक्शन फार्म भी अग्रेजी मे होता है यह तक कि टेंण्डर भी अंग्रेजी भाषा के अखबार में प्रकाशित किया जाता है।

सोलह बनाम चौरासी की सियासत के भंवर में अटके सियासी दल !

‌सामाजिक न्याय व समरसता का ढिंढोरा पीटने वाले राजनीतिक दल पहले तो सवर्णों को आरक्षण के जाल में उलझा कर रखने और अब एससी एसटी एक्ट के बहाने उन्हें और प्रताड़ित कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने का एक और जरिया ढूंढ लिया है । जिस तरह भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने का कृत्य किया है । इसे भी जातीय राजनीति करने वालों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है।  राष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीटने वाली भारतीय जनता पार्टी क्षेत्रीय दलों की श्रेणी में शामिल हो गई है ,जो कि क्षेत्रवाद और जातिवाद की राजनीति करते हैं। बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपने संविधान में आरक्षण को 10 वर्ष के लिए लागू किया किया था।  जिसकी उस समय सामाजिक समरसता लाने की व अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए अति आवश्यकता थी। इस अधिनियम को समय-समय पर हर 10 वर्ष पर आगे बढ़ाया गया ,जो कि तर्कसंगत भी है । लेकिन अब इसका भी दुरुपयोग होने लगा है , क्योंकि इसका लाभ क्रीमी लेयर के लोग भी उठा रहे हैं । इसलिए काफी समय से मांग उठ रही है कि इसे गरीबी के आधार पर लागू किया जाए । लेकिन राजनीतिक दल अपनी वोट की राजनीति के खातिर सभी वर्गों के साथ अन्याय कर…

‌आग से आग तक का सफ़र .......आर0के0स्टूडियो

‌जाने कहाँ गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में नज़रों को हम बिछाएंगे चाहे कहीं भी तुम रहो, चाहेंगे तुमको उम्र भर तुमको ना भूल पाएंगे जाने कहाँ गए वो दिन ...जी हाँ ये पंक्तियाँ देश के सबसे बड़े शोमैन स्व0 राजकपूर की फ़िल्म मेरा नाम जोकर के गाने की हैं। जिनके हर शब्द आज के समय में माकूल बैठ रहा है। कभी मुम्बई की फिल्मसिटी का सिरमौर रहा आर0के0 स्टूडियो अब बिकने के कगार पर है। उसकी दीवारें गुजरे ज़माने को याद कर रही हैं। सच भी है जब इस इमारत में नए कलाकारों की किस्मत लिखी जाती थी ,उनका भविष्य तय होता था उस ज़माने में आर0के0 स्टूडियो की बादशाहत हुआ करती थी। लेकिन आग से शुरू और आग पर ही ख़त्म हो रही इस स्टूडियो की कहानी। अभिनेता स्व0 राजकपूर द्वारा 1951 में स्थापित आर0के0 स्टूडियो ने अपने 70 साल के सफर में बहुत सी यादों को समेटे हुए हैं। राजकपूर अभिनेता के साथ साथ प्रोडूसर डायरेक्टर भी रहे ।इनकी फिल्मों में विविधता के साथ सामाजिक सरोकार भरी होती थी। जीवन के अनेक करेक्टर को उन्होंने अपने अभिनय से जीवंत किया है ।इसलिए इन्हें फ़िल्म इंडस्ट्री का सबसे बड़ा शोमैन भी कहा जाता था। उनकी पहली फिल्म आग थी जिसमें…

दोराहे पर खड़ी है, देश की राजनीति

देश की राजनीति ऐसे मुहाने पर खड़ी है कि राजनेताओं की बुद्धि कुंद होती जा रही है। सोचने समझने की समझ पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।  आखिर इस लोकतांत्रिक देश का भविष्य दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है,कि जनता भी नहीं समझ पा रही है , क्या सही है, क्या गलत है, हर बात , हर घटना को मीडिया भी ऐसा पेश कर रही है  कि जनता के लिए सही गलत का फैसला करना भी कठिन हो रहा है। इस विशाल लोकतंत्र में तरह - तरह की भाषाएं बोलने वाले अलग-अलग जाति व धर्म के लोग रहते हैं, उनका रहन सहन रीति रिवाज व अलग अलग प्राकृतिक माहौल में जीवन यापन करते हैं। यही अनेकता में एकता का बोध कराते हैं । लेकिन पिछले कुछ दशक से देश में जाति भाषा धर्म क्षेत्र आदि जैसे मुद्दे पर देश को बांटने का काम किया जा रहा है। इतना ही नहीं अनेक तथाकथित राजनीतिक दलों के नेता  देश में लिंचिंग जैसे मामलों को लेकर देश के बंटवारे की बात करते हैं। अभी हाल ही में BJP व पीडीपी के बीच जम्मू कश्मीर में सरकार का समझौता टूटने के बाद पूर्व मंत्री मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती व उनकी  पार्टी के नेता अनाप-शनाप बयानबाजी कर रहे हैं । महबूबा मुफ्ती को कश्मीर में सलाउद्दी…

पीएम मोदी की हत्या की साजिश खुलासे को लेकर राजनीति क्यों....!

पीएम मोदी की हत्या की साजिश में राजनीति क्यों ....!
‌देश की राजनीति की दिशा किस मोड़ पर पंहुच रही है, अनेक सवाल उठने लगे हैं। आज की राजनीतिक उठापटक लोकतांत्रिक ढांचे को कितना मजबूत या कमजोर करेगी इसका आकलन होना बाकी है। जिस देश में आतंक की बेदी पर दो-दो प्रधानमंत्रियों के जीवन का बलिदान हो गया हो , वहीं प्रधानमंत्री की नक्सलियों द्वारा हत्या की साजिश मामले में विपक्षियों ने दलित मुद्दा खोजना शुरू कर दिया है, कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है। आतंकी हों या फिर नक्सली हों । ये सभी मानवीय दुश्मन ही हैं। अगर इनमें भी मुस्लिम या फिर दलित के नाम पर इनका बचाव किया जाय तो एक लोकतंत्र के लिए इससे शर्मनाक घटना और क्या हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश का खुलासा हाल में हुई कोरेगांव के दंगे की  सुरक्षा एजेंसियों की जांच के दौरान हुई। इस घटना के तार तो नक्सलियों से जुड़े हैं।इस जांच के दायरे में कई जाने माने वामपंथी सोच के प्रोफेसर आये जो नक्सलियों के पक्षधर के रूप में जाने जाते हैं। इन्हें पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया और इनके घरों में सुरक्षा एजेंसी को अनेक दस्तावेज व चिट्ठियां मि…